गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

आँखों में जो सपने न सजाए होते ( ग़जल )

आँखों में जो सपने न सजाए होते
सरेराह अपने, यूँ न पराये होते

मालूम होता अगर मुश्किल है सफ़र
तो हमने भी कुछ हमराह बनाए होते

गैरों पर भी कुछ इल्जाम लगा देता मगर
अपनों नें जो ज़ख्म न लगाए होते

जिनके नाम पर उठ रहीं हैं महफिल में उँगलियाँ मुझपर
काश आज वो भी मेरी बज़्म में आये होते

जिनकी निगाहों से छलकती थी शबनम-ए-वफ़ा
बाकरम वो बदले-बदले से नज़र न आये होते

अब समझा हूँ कि कागज के फूल से जो आती खुशबू
गुलशन इस कदर दुनियां में  न लगाए जाते


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(सुशील कुमार)
15, दिसम्बर 2011
दिल्ली 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
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