सोमवार, 8 नवंबर 2010

बाँझ (लघुकथा)

बलात्कार के एक महीने बाद ही महुआ के पेट से होने की खबर पूरी बस्ती में फ़ैल गई | गोबर्धन शाम को रोज की तरह थका-हारा नशे में धुत घर लौटा तो सब उसे घूरने लगे | बुझे हुए चेहरों पर तीर सी तीखी आंखे देख उसने सबसे पूछा कि आखिर क्या बात है, पर कोई कुछ न बोला | जामुनी भाभी से रहा न गया और वह चीख कर बोली "जा कमरे में अपनी नामर्दी का साबुत देख ले |" गोबर्घन को समझते देर न लगी कि पिछले पाँच साल की शादी-शुदा ज़िन्दगी में महुआ के पाँव जो भारी न हो पाए वो पिछले महीने इज्जत लुटने के बाद हो गए |
गोबर्धन उस कोठरी में दाखिल हुआ जहाँ महुआ सुबह अस्पताल से आने के बाद से ही रो रही थी | छोटी सी कोठरी महुआ की सिसकियों से भरी जा रही थी | गोबर्धन के मुंह पर ताला लगा था और शरीर जैसे काठ हो गया था |  कोशिश भी की तो कंठ ने साथ न दिया | एक भी शब्द मुंह से निकल न पाया | सोचता रहा कि आखिर क्या बोलूं ? बहुत मुश्किल घडी थी मानो पूरा बदन पत्थर हो गया हो |  वह आत्मग्लानी से मरा जा रहा था | झट से वह महुआ के पैर पर जा गिरा | बड़ी मुश्किल से बोल पाया " हमको माफ़ कर दो महुआ " | महुआ रोती रही, कुछ न बोली | बहुत देर तक दोनों के बीच संवादहीनता रही | गोबर्धन फिर बोला "हमको माफ़ कर दो महुआ, हम तुमको बहुत दुःख दिए हैं | कमी मुझमे थी और माँ, दीदी, मौसी सब तुमको जिंदगी भर गरियाती रहीं- कुलक्षणी, बाँझ है बाँझ | बस एक बार हमको माफ़ कर दो "   
महुआ ने झट पाँव खिंच लिया जैसे कोई पाप हो गया हो | भला पति-परमेश्वर पत्नी के पाँव छू सकता है कभी | वह फूट-फूट कर रोने लगी पर कुछ बोल न पायी |
** सुशील कुमार **

12 टिप्‍पणियां:

  1. aaj ke samay ki ek hakikat yah bhi hai, usi sandarbh me kah raha hu jis sandarbh me yah laghukatha likhi gai hai,

    swagat hai hindi blogjagat me, shubhkamnaon k sath...

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  2. चिट्ठा जगत से जुडऩे पर आपका स्वागत है।

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  3. शानदार और जानदार लघु कथा - सारगर्भित रचना के लिए हार्दिक बधाई

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  4. हमारे एगरीगेटर पर आपका ब्लाग जोड़ने के लिए धन्यवाद
    आपके ब्लाग को सफलता पूर्वक जोड़ दिया गया है। अब आप इस एगरीगेटर के लोगों को अपने ब्लाग पर लगा सकते है। जिसे आपकी पोस्ट तुरंत छप सके और आप ज्यादा से ज्यादा लोगों के ब्लाग पर टिप्पणियां देने की
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  5. बहुत अच्छी लघुकथा .....इसका समापन दिल को छु लेने वाला है.

    .सृजन_शिखर (www.srijanshikhar.blogspot.com ) पर आपका स्वागत है.

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  6. कृपया वर्ड वेरिफिकेसन हटा ले तो कमेन्ट देने मे आसानी रहेगी. ( setting - comment - show word verification-no)

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  7. लेखन अपने आपमें रचनाधर्मिता का परिचायक है. लिखना जारी रखें, बेशक कोई समर्थन करे या नहीं!

    बिना आलोचना के भी लिखने का मजा नहीं!

    यदि समय हो तो आप निम्न ब्लॉग पर लीक से हटकर एक लेख

    "आपने पुलिस के लिए क्या किया है?"
    पढ़ सकते है.

    http://baasvoice.blogspot.com/
    Thanks.

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  8. सुशील जी आपकी लेखनी में कुछ बात तो है ,जो दिल को छु जाती है.बाँझ कहानी भी अच्छी लगी.बस ऐसे ही लिखते रहिये.

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