शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

राजीव भाई का निधन

साभार : सरेबाजार / चित्र : गूगल 

क ऐसी क्षति जिसकी भरपाई नामुमकिन है! लेकिन यह महज दुःख कि बात नहीं है कि राजीव भाई नहीं रहे, एक हैरानी की बात भी है कि देश की मिडिया ने उनके निधन की ख़बर  देशवासियों को देने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखायी | भला क्यों करती है मीडिया ऐसा वर्ताव ? इस दोहरे चरित्र का क्या राज है? जवाब साफ़ है कि राजीव भाई पूंजीपतियों और विदेशी कंपनियों के खिलाफ लड़ रहे थे और मीडिया उन्ही के हाथों की कठपुतली है| उस आदमी को कैसे प्रसिद्धी दे सकती है मीडिया जो पूंजीपतियों की मुखालफत करता हो, चाहे यह उनके मृत्यु का समाचार ही क्यूँ न हो | धिक्कार है ऐसी पत्रकारिता पर, धिक्कार है ऐसे मीडिया घरानों पर| चड्डी-बनयान के रंग और अवैध संबंधो का सनसनीखेज खुलासा करने वाले पत्रकारों, समय रहते जाग जाओ, वरना इतिहास तुम्हे कभी माफ़ नहीं करेगा !
बहरहाल, "सरेबाज़ार" किसी पूंजीपति या विदेशी कंपनी की रखैल नहीं है, इसलिए हम राजीव भाई के स्वदेशी आन्दोलन की अलख जला कर रखेंगे| हमारे नए पाठक स्वर्गीय राजीव भाई के बारे में जानने के लिए यहाँ चटका लगायें ! 
  

3 टिप्‍पणियां:

  1. श्रद्धा सुमन,एक महान आत्मा के चरणों में!!

    @ मिडिया आज कारपोरेट घरानोँ की गुलाम है .बाबा रामदेव और राजीव जी का भारत स्वाभिमान भ्रष्ट राजनेताओँ, बयूरोक्रेट और देश को दीमक की तरह चाटते कारपोरेट के खिलाफ आन्दोलन है। ऐसे मेँ मीडिया के माध्यम से ऐसी खबरोँ का आना उनके अपने ही पैर पर कुल्हाडी होगी।
    हा आजाद है हमारी मीडिया ऐसी खबरोँ के लिये जो TRP बढाकर विज्ञापन बटोर सके । फिल्मी गासिप , भूत-प्रेत जैसी खबर जो हम सिर्फ देखकर मजे लेँ ना कि सोँचकर दूसरोँ के लिये मुसीबत बनेँ।

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