सोमवार, 24 जून 2013

घर-बाज़ार





















जैसे-जैसे मुहल्ले में 
भीड़ बढ़ती गई 
बाज़ार को जगह देने के लिए 
घर सिमटने लगे 
पता ही नहीं चला  
कब दबे-पाँव घरों में
घुस आया बाज़ार   

शहर के तंबू में 
पनाह लिए हुए 
गाँव सोचता है  
कि कोई और गाँव आए  
तो दुआ-सलाम हो 


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सुशील कुमार 
दिल्ली, 24 जून, 2013



(तश्वीर : गूगल से साभार) 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढिया ,
    शहर के तंबू में
    पनाह लिए हुए
    गाँव सोचता है
    कि कोई और गाँव आए
    तो दुआ-सलाम हो ...क्या बात है जी कमाल है कमाल

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