शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

शहर में चांदनी

भागो कि सब भाग रहे हैं
शहर में
कंकड़ीले  जंगलों में
मुंह छिपाने के लिए

चाँद
ईद का हो या
पूर्णिमा का
टी.वी. में निकलता है अब
रात मगर क्या हुआ

मेरी परछाई के साथ
चांदनी चली आई
कमरे में
सौम्य, शीतल,
उजास से भरी हुई

लगा मेरा कमरा
एक तराजू है
और
मै तौल रहा हूँ
चांदनी को
एक पलड़े में रख कर
कभी खुद से
कभी अपने तम से

लगा रहा हूँ हिसाब
कितना लुट चुका हूँ
शहर में !

** सुशील कुमार **

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपका ब्लॉग देखा,बहुत ही अच्छा लगा,बहुत बहुत बधाई आपकी कुछ कविताओं को मैंने पढ़ा.अच्छी लगी .संभावनाओं के शहर में ,डिग्री ,नया क्या है इत्यादि सभी कवितायें बहुत ही अच्छी लगी,ऐसे ही लिखते रहिये .पावेल परवेज़ ,पटना.

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  2. बहुत ही सुन्दर कबिता है...हिसाब लगा रहा हूँ कितना लुट चूका हूँ शहर में

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