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शनिवार, 8 जून 2013

चार मुक्तक : सुशील कुमार

चार मुक्तक : सुशील कुमार 

(1)
लबों पर इलज़ाम लगे हैं, खामोश रह जाने के लिए
मुजरिम अल्फ़ाज भी हैं, साथ न निभाने के लिए 
है कहाँ मुमकिन बयान-ए-बेकरारी
ये फलसफा तो है बस समझ जाने के लिए

(2)
प्रेम की हर कसौटी पर खरा उतरा हूँ 
दकियानूस जमाने के लिए मैं बड़ा खतरा हूँ
दुनियाँ के रास्ते अब मुश्किल न होंगें
तेरी जुल्फ़ की पेंचों से होकर जो गुजरा हूँ

(3)
चारो तरफ है अफरातफरी, 
ये कैसी डगर है 
बुझे-बुझे चेहरों वाला कैसा महानगर है
राशन की कतार में खडा हूँ सुबह से
गाँव से बिछड़कर जीवन एक मीठा जहर है


(4)
जीवन के सफ़र में देखो, है कितना तन्हा आदमी 
रहता है वह महफ़िलों में, फिर भी है तन्हा आदमी
आता है इस रंग मंच पर तन्हा अपना पाठ लिए 
जाएगा भी इस भू पटल से देखो तन्हा आदमी

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

हम-तुम

हम वो हैं जिसका 
कभी तुम्हे गुमाँ न हुआ 
तुम वो हो जिसकी वजह से 
हम मगरूर कहे जाते हैं जमाने में
 
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(सुशील कुमार)
फरवरी 7, 2012  दिल्ली

सोमवार, 30 जनवरी 2012

हसीन इत्तेफ़ाक

ये महज़ कोई
हसीन इत्तेफ़ाक तो नहीं हो सकता

कि तुम जब आये
तब
हासिल करने के लिए पूरी कायनात थी

और जब गए
तब
खोने के लिए कुछ भी नहीं है

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(सुशील कुमार)
जनवरी 30, 2012
राजकोट, गुजरात

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

दरियाई आँखें

तश्वीर गूगल से साभार
















अपनी आगोश में दरिया 
किसी को देर तक पनाह नहीं देता 

ये फितरत ही है उसकी 
कि आगोश में लेकर
साहिल के हवाले कर देता है एक रोज

शुक्र है कि उन दरियाई आँखों पर
कभी ऐतबार न हुआ मुझको . . .


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(सुशील कुमार)
जनवरी 27 , 2012
राजकोट, गुजरात

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

फलसफा

लबों पर इलज़ाम लगे हैं, खामोश रह जाने के लिए
मुजरिम अल्फ़ाज भी हैं, साथ न निभाने के लिए
है कहाँ मुमकिन बयान-ए-बेकरारी
ये फलसफा तो है बस समझ जाने के लिए

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सुशील कुमार
26 दिसम्बर, 2011
दिल्ली    

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

कसूरवार

जफ़ा बयां कर रहीं थी निगाहें
हम पढ़ न सके और
कसूरवार तुम्हें ठहरा दिया ......


(सुशील कुमार)

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

शहर की दीवारों पर खुदे नाम

सबूतों का हवाला देकर,
तुम बच गए कैसे
शहर की दीवारों पर खुदे नाम,
कुछ और ही बयाँ करते हैं....


(सुशील कुमार)

इज़हार

खामोशी का कुछ मतलब ढूंढता रहा मैं
ये देखे बिना कि
तुम्हारी आँखें भी कह रही थीं कुछ ....


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(सुशील कुमार  ) 
दिल्ली 
दिसम्बर 3, 2011 

ज़िन्दगी के रास्ते

ज़िन्दगी के रास्ते अब मुश्किल न होंगे,
तेरी जुल्फ की पेंचो से होकर जो गुजरा हूँ !