गुरुवार, 28 जून 2012
बुधवार, 6 जून 2012
गुरुवार, 17 मई 2012
सोमवार, 7 मई 2012
आईना
एक ऐसा राजदार है मेरे कमरे में
जिसे पता हैं
उम्र भर अपने सीनें में
उसने दफ़्न रखा है मेरी हकीकत को
वह तब-तब हँसता होगा मुझपर
जब-जब अपना चेहरा साफ़ करने के लिए
मैं उसका बदन चमकाता हूँ
भावहीन एकटक वर्षों से वह
आत्मसात कर लेना चाहता हो
खुद में उतार कर
एक भावहीन तराजू में
रोज तौला जाता हूँ
इस बात से बेखबर कि
है कुछ जगह
बस एक क्षणभंगुरता ही है
जो हमदोनों को
समानुभूति की धरातल पर
एक साथ खड़ा करती है
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सुशील कुमार
दिल्ली
मई 7, 2012
जिसे पता हैं
मेरी सारी खूबियाँ और खामियाँ
फिर भी भरोसेमंद इतना किउम्र भर अपने सीनें में
उसने दफ़्न रखा है मेरी हकीकत को
वह तब-तब हँसता होगा मुझपर
जब-जब अपना चेहरा साफ़ करने के लिए
मैं उसका बदन चमकाता हूँ
भावहीन एकटक वर्षों से वह
सिर्फ चुपचाप निहारता है मुझे
जैसे मेरे अस्तित्व कोआत्मसात कर लेना चाहता हो
खुद में उतार कर
एक भावहीन तराजू में
रोज तौला जाता हूँ
इस बात से बेखबर कि
किसी की आँखों में
मेरी गफलतों के लिए भीहै कुछ जगह
बस एक क्षणभंगुरता ही है
जो हमदोनों को
समानुभूति की धरातल पर
एक साथ खड़ा करती है
---------------------------------
सुशील कुमार
दिल्ली
मई 7, 2012
शनिवार, 5 मई 2012
बदन पर सिंकतीं रोटियाँ
गरम-गरम रोटियों के लिए
तुम्हारे भी पेट में
आग धधकती होगी
कितना अच्छा लगता है
जब माँ या पत्नी तुम्हारे लिए
सेकतीं है गरमा-गरम रोटियाँ
लेकिन
एक गली है इस शहर में
जहाँ रोटियाँ तवे की मुहताज नहीं हैं
बल्कि बदन पर सेंकीं जाती है
यहाँ बदन को तपाकर
इतनी गर्मी पैदा कर ली जाती है कि
उस पर रोटियाँ सेंकी जा सके
तुम जान भी नहीं पाते हो
कि तुम्हारी सहानुभूति के छींटे
कब छनछनाकर उड़ जाते हैं
इस लहकते शरीर से
यहाँ शरीर की रगड़न से पैदा हुई
चिंगारियों को अंगीठी में सहेज कर
क्रूर सर्द रातों को गुनगुना बनाया जाता है
इस गली तक चल कर आते हैं
शहर भर के घरों से रास्ते
और शायद यहीं पर खत्म हो जाते हैं
क्यूंकि इस गली से कोई रास्ता
किसी घर तक नहीं जाता
तुम बात करना अगर मुनासिब समझो
तो जरा बताओ कि क्या तुमनें कभी
बदन पर सिंकतीं हुई रोटियों को देखा है यहाँ
शायद नहीं देखा होगा
क्यूंकि यहाँ से निकलते ही
जब तुम अपनी पीठ
इस गली की तरफ करते हो
नजरें चुराने में माहिर तुम्हारी आँखें
तुम्हारे भी पेट में
आग धधकती होगी
कितना अच्छा लगता है
जब माँ या पत्नी तुम्हारे लिए
सेकतीं है गरमा-गरम रोटियाँ
लेकिन
एक गली है इस शहर में
जहाँ रोटियाँ तवे की मुहताज नहीं हैं
बल्कि बदन पर सेंकीं जाती है
यहाँ बदन को तपाकर
इतनी गर्मी पैदा कर ली जाती है कि
उस पर रोटियाँ सेंकी जा सके
तुम जान भी नहीं पाते हो
कि तुम्हारी सहानुभूति के छींटे
कब छनछनाकर उड़ जाते हैं
इस लहकते शरीर से
यहाँ शरीर की रगड़न से पैदा हुई
चिंगारियों को अंगीठी में सहेज कर
क्रूर सर्द रातों को गुनगुना बनाया जाता है
इस गली तक चल कर आते हैं
शहर भर के घरों से रास्ते
और शायद यहीं पर खत्म हो जाते हैं
क्यूंकि इस गली से कोई रास्ता
किसी घर तक नहीं जाता
तुम बात करना अगर मुनासिब समझो
तो जरा बताओ कि क्या तुमनें कभी
बदन पर सिंकतीं हुई रोटियों को देखा है यहाँ
शायद नहीं देखा होगा
क्यूंकि यहाँ से निकलते ही
जब तुम अपनी पीठ
इस गली की तरफ करते हो
नजरें चुराने में माहिर तुम्हारी आँखें
सिर्फ अपने घर के दरवाजे पर टिकी होती है |
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सुशील कुमार
मई 5, 2012
दिल्ली
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
एक मौत ही साम्यवादी है
वह माटी की सौंधी गंध का मुरीद था
सुनता था कहीं कोई चटकन सुनायी तो नहीं देती
कलियों के फूल बनने की प्रक्रिया में
इन्द्रधनुष की खबर
गाँव भर में देता फिरता सबसे पहले
पैरों के तलवे को छूने वाली
एक-एक ओस की बूंद को वह पहचानता था
बसंत में वह ऐसे झूमता जैसे
गुलमोहर और पलास उसी के लिये रंग बिखेरने आये हों
अगर अपनी धुन में जीता
तो वह कवि होता
लेकिन फांकाकशी में
चाँद भी रोटी दिखता है
कब तक सौन्दर्यबोध में जीता
और दवाईयों के लिए
लोगों के सामने हाथ फैलाता
भूख की लड़ाई में
एक के बाद एक
सबने अलविदा कहा
पिता, बड़ा भाई, माँ और चाचा
और वह जान पाया कि
हर काली रात एक
सुर्ख सुबह पर जा कर ख़त्म होती है
जहाँ सब के हिस्से में एक बराबर आती है मौत
इस क्रूर व्यवस्था में
एक मौत ही साम्यवादी है
उसने जो पहली कविता लिखी
वह कविता नहीं, सुलगते कुछ सवाल थे
या कहें चंद सवालात की पूरी कविता
कि आखिर वह कौन है जो
समाजवादी तरीकों से मौत तय करता है
और जिंदगी बाँटते समय पूंजीवादी हो जाता है ?
वह कौन सा फार्मूला है कि
जिन मुश्किल दिनों में बामुश्किल
मेरे घर में कफ़न खरीद कर लाये जाते हैं
उसी दौर में पडोसी के घर
चर्बी घटाने की मशीनें आती है ?
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सुशील कुमार
18, अप्रैल 2012
दिल्ली
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इस कविता को नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले "मुक्ति संघर्ष" (साप्ताहिक) ने 2 से 8 जून 2013 वाले अंक में प्रकाशित किया था |
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इस कविता को नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले "मुक्ति संघर्ष" (साप्ताहिक) ने 2 से 8 जून 2013 वाले अंक में प्रकाशित किया था |
शनिवार, 14 अप्रैल 2012
मुखौटा
रोज की तरह
शाम को घर लौटा
उतार दिया एक-एक कर
कमीज, पतलून, चश्मा और जूते
बेटे को गोद में उठाया ही था कि
वह जोर-जोर से रोने लगा
ऐसा लगा किसी अजनबी नें
लपक लिया हो उसको
मैनें भाग कर आईने में
अपना चेहरा देखा
ओह, कई चेहरे चिपके हैं परत-दर-परत
एक-एक कर
उतारता गया चेहरों को
ये कन्सलटेंट गया
ये समाजसेवी
ये एक्टिविस्ट
ये प्रशिक्षक
ये मूल्यांकनकर्ता
ये कवि भी गया
अब अपनी जेब से
निकाल कर पापा का चेहरा
चिपकाया खाली-खाली से मुखड़े पर
बेटे को गोद में उठाया
और
घोडा-घोडा खेलता रहा बहुत देर तक
उसके साथ
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सुशील कुमार
दिल्ली, 14 , अप्रैल 2012
श्रोत : http ://sambhawnaonkashahar.blogspot.in
शाम को घर लौटा
उतार दिया एक-एक कर
कमीज, पतलून, चश्मा और जूते
बेटे को गोद में उठाया ही था कि
वह जोर-जोर से रोने लगा
ऐसा लगा किसी अजनबी नें
लपक लिया हो उसको
मैनें भाग कर आईने में
अपना चेहरा देखा
ओह, कई चेहरे चिपके हैं परत-दर-परत
एक-एक कर
उतारता गया चेहरों को
ये कन्सलटेंट गया
ये समाजसेवी
ये एक्टिविस्ट
ये प्रशिक्षक
ये मूल्यांकनकर्ता
ये कवि भी गया
अब अपनी जेब से
निकाल कर पापा का चेहरा
चिपकाया खाली-खाली से मुखड़े पर
बेटे को गोद में उठाया
और
घोडा-घोडा खेलता रहा बहुत देर तक
उसके साथ
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सुशील कुमार
दिल्ली, 14 , अप्रैल 2012
श्रोत : http ://sambhawnaonkashahar.blogspot.in
मंगलवार, 10 अप्रैल 2012
शहर में घर का सपना
माथे के पसीने का
एड़ी तक पहुँच जाने पर भीपचास गज का एक अदद फ्लैट
सपना ही बना रहा
शहर में गजों में नापी जाती है तुम्हारी औकात
गाँव का कट्ठा, बीघा और एकड़ के मुकाबले
पचास, सौ या दो सौ गज की हैसियत
बहुत बड़ी है शहर में
गाँव में सिर्फ कब्र नापी जाती है गज में
और वह दो गज जमीन भी
तुम्हारी वास्तविक हैसियत बताने के लिए
बड़ी पड़ जाती है
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सुशील कुमार
दिल्ली, अप्रेल 10, 2012
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